मंगलवार, 11 मई 2010

सिर्फ दो मुट्ठी राख

डॉ.गिरीश नागड़ा


जब-जब भी आँखें खोली हैं
आँखों की पोरें गीली हैं
नींद तो कभी आई ही नहीं
पर एक स्वप्न जीवन भर
आँखों में पलता रहा
बर्फ पिघलेगी कभी
क्रूर, गर्वित, उन्नत ठंडे
हृदयहीन समय की।
आएगा कभी
उस उष्मा का मौसम
जब मैं और तुम
हँस सकेंगे
सारी फिजाँ को जी भरकर
प्यार करते हुए।
गले लगते-लगाते हुए
महसूस कर सकेंगे
अपरिमित हर्ष।
हमारे बीच,
कहीं ईर्ष्या, विद्वेष,दर्प
घृणा,नफरत और अहंकार
मेरा, तुम्हारा
धर्म, धन, सम्पदा,
देश, राज्य, नस्ल और भाषा का
कहीं कोई भेद न रहेगा
हम देखेंगे
कुदरत की हर नियामत को
कृतज्ञता के झरोखों से
और आती हुई प्राणवायु को
नथूनों में भरकर
छाती को फूला सकेंगे
जीवन के हर क्षण को,
अमृत-सा पी सकेंगे
पूरे-पूरे आदमी होकर जी सकेंगें
क्योकि हम जानतें हैं
हमारा अपना सच
सिर्फ दो मुट्ठी राख है
वह भी हमारी नहीं
इसी जहाँ से हमने पाई है
और वह भी
यहीं रह जाएगी।
by girish.nagda

कोई टिप्पणी नहीं: