शनिवार, 12 जनवरी 2013

बाते तो बड़ी अच्छी कर लेते हो
पर बातो की गहराइयों में
जाने की ताब और आब
न तुममे है न इनमे है ।।

नमाजी बनकर रोज़े रखकर
 मोमिन तो बन गए
पर इन्सान  बनने की ताब और आब
न तुममे है न इनमे है ।।

दुनियादारी निभा रहे हो तो
दुनिया दार ही रहो
दिल को दिल से
मिलाने की ताब और आब
न तुममे है न इनमे है ।।

तुम क्या हो ,क्या है तुम्हारा वजूद
जान लो ईमानदारी के एक
झोंके से बिखर जाओगे
घना दरख़्त बनने की ताब और आब
न तुममे है न इनमे है ।।

मत करो ज़िद क़रीब आने की
किसी मजलूम को लूट कर
चाहे हाजी भी बन गए
दिल को दिल से
मिलाने की ताब और आब
न तुममे है न इनमे है ।।

ऱोज सॊ चूहे खाकर भी तुमने
हज तो कर लिया
अपने नाखूनों को छुपाकर
मुझसे आखँ मिलाने की ताब और आब
न तुममे है न इनमे है ।।
- गिरीश नागडा

मंगलवार, 15 मई 2012

अब पछताए होत क्या ?


अब पछताए होत क्या ?


अब पूछ रहे हो ,सोच रहे हो
कि राह कौन सी जाऊ मै
अगर समय से पूर्व जाग जाते
तो यूँ  चोराहे पर लुटता नहीं चीर
दरबारियों स्तुति गानों से उपजी
आत्ममुग्धता में खो न जाते
तो प्यादे से नहीं पिटता यूँ वजीर ||
स्वयं को सर्वोपरिय मानकर
अहं भाव में यूँ डूबे न होते
विरक्ति रचने का विचार
पश्चाताप के साथ करना न पड़ता
दृढ निश्चय कर राष्ट्र हित के मुद्दों पर
अटल अगर रहते अटल
तो यूँ सपना जन्म लेकर मर न पाता
घुटने नहीं टेकते राष्ट्र के स्वाभिमान के मुद्दों पर
तो मधु ऋतु ,में बाग कदापि यूँ झर न पाता ||
आप और आपके दरबारी
आम जन से /सच्चे मन से / जुड़ पाते
उनकी व्यथाओ कि पीड़ा को पढ़ पाते
तो न तिनके बिखरते
न नयी सृष्टि रचना कि चिंता में
यूँ स्वयं को डूबने को विवश पाते ||
जिस विश्वास के साथ सौंपा था राज आपको दिल्ली का
उस विश्वास को नहीं दिखाते पीठ
उस विश्वास की सत्यनिष्ठा से रखते लाज
प्रश्न ही नही उठता उधारी का न घाटे का आज ||
राष्ट्रहितो की सतत कर उपेक्षा
अंतरराष्ट्रीय लोकनायक बनने की भूख के चलते
सतत सर्व प्रशंसनीय होना चाहा था आपने
आपको तो पता ही है कि
दो कश्ती में  करने वाले सवारी
कितना भी हिसाब जोड़े
न घर के रहते है, न घाट के ||

-गिरीश नागडा

राह कौन सी जाऊ मै ?


राह कौन सी जाऊ मै  ?
(अटल बिहारी वाजपेई )
 अटलजी कि कविता सत्ता से हटने के बाद -२४ मई २००४ को समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई थी


राह कौन सी जाऊ मै  ?
चोराहे पर लुट-ता  चीर
प्यादे से पिट गया  वजीर
चलूं  आखिरी चल की बाज़ी
छोड़ विरक्ति रचाऊ मै
राह कौन सी जाऊ मै ?
सपना जन्मा और मर गया
मधु ऋतु ,में ही बाग झर गया
तिनके बिखरे हुए बटोरू या
नवसृष्टि सजाऊ मै ?
राह कौन सी जाऊ मै  ?
दो दिन मिले उधार में
घाटे के व्यापार में
क्षण - क्षण का हिसाब जोडू या
पूंजी शेष लुटाऊ मै ?
राह कौन सी जाऊ मै ?

- अटल बिहारी वाजपेई
17 मई 2004
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सोमवार, 26 मार्च 2012

नहीं बिलकुल नहीं बी जे पी अपने जन्म से लेकर आज तक कभी इमानदार नहीं रही न तो सत्ता में रही तब न विपक्ष में है तब ,सच पूछा जाय तो बी जे पी में कभी कोई ठोस नेतृत्व रहा ही नहीं . बेईमानो को निकाल बहार करने की ताकत, दृढता कभी नहीं रही और इमानदार का साथ देने की ताकत, दृढता भी कभी नहीं रही मेरा दृढ़ मत हे कि अगर बी जे पी ईमानदारी पूर्वक अपनी भूमिका निभाती तो आज इस देश कि दशा और दिशा कुछ और ही होती .हारने के बाद अटलजी ने एक कविता लिखी थी उसका मैंने कविता से ही जवाब दिया था यहाँ उसका अवलोकन भी मौजू रहेगा प्रस्तुत हे नेक्स्ट पोस्ट में दोनों कविताऐ - गिरीश नागडा

सोमवार, 19 जुलाई 2010

क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है ?

मुझे राष्ट की व्यथा बहुत सताती है
आज की कटु यथा बहुत सताती है
राष्ट पर लटक रहे
खतरो की चिन्ता कभी सताती है ?
क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है
राष्ट की व्यथा बहुत सताती है ...?

किसी त्योहार की उमंग नही है
दिल में मनोरंजन की तरंग नही है
किसी खोल में रूची नही है
देर रात तक नींद न मुझको आती है
क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है
राष्ट की व्यथा बहुत सताती है ...?

पदासीन पथप्रदर्शक और रक्षक
सब झूठे से लगते है महान आत्माओं के
अजादी से उम्मीदो के
सारे सपने झूठे से लगते है
नेताओ कें हर भाषण से
झूठ बनावट की बू आती है
क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है
राष्ट की व्यथा बहुत सताती है ...?

शुक्रवार, 25 जून 2010

तुम्हारी मुस्कान से

लग रहा था
सभी कुछ भयावह
छूट रहा था मन का धैर्य
पथराने लगी थी आंखे
नही बंध पा रहा था मन
किसी भी माया में
खो चुके थे
समस्त आकार्ण,अपना रूप ॥

ना जाने कितने दिनो तक
ऐसी एकरस, नीरस रही जिन्दगी
होले होले दिन बदले तारीखे भी बदली
फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ
आकाश पर छाये बादल हटने लगे
शहर का मेौसम बदलने लगा
और तुम्हारे चेहरे पर लौट़कर आई मुस्कान
बाग लहराया कलियाँं चटकी
और फूल भी खिलखिलाने लगे
आंँखो आंँखो मे गुपचुप बाते हुई
बर्फ पिघलने लगी
तमाम शिकवे शिकायते बह गई
भय बंधन तिरोहित हुए
नजरे भी चंचल होने लगी
मन फिसलने लगा
कल तक जो डूबा था,
असीम गहरे दर्द में
वे सारे घाव भरने लगे
मन नैतिक मर्यादाओ के बंधन को लांघने,
मिलन के गीत गाने के लिए मचलने लगा
एक तुम्हारी मुस्कान से
सारा का सारा जहाँं
खुशनुमा लगने लगा ॥

गिरीशनागड़ा

शनिवार, 5 जून 2010

इन्तजार

मै हर वक्त
हर क्षण
तुम्हारे प्यार,उर्जा का
तलबगार रहा हूं।
मै रहा हूं
हर क्षण
प्यासा
तुम्हारे प्यार का ॥

तुम्हारे इन्तजार के
लम्हो को
जितना मैने झेला है
सदियो सा
एहसास दे गया
वह इन्तजार॥
मै यहॉँ जीवन पथ पर
अकेला निपट
एकाकी खड़ा
झेल रहा हूं
उस कड़ी धूप को भी
हंसते हंसते,
क्योकि
मुझे यहाँं से
दिखाई दे रही है
तुम्हारी पालकी की गुम्मद
और यहाँं की हवाओ मे
आ रही है
तुम्हारे आने की महक ॥

गिरीशनागड़ा