सोमवार, 19 जुलाई 2010

क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है ?

मुझे राष्ट की व्यथा बहुत सताती है
आज की कटु यथा बहुत सताती है
राष्ट पर लटक रहे
खतरो की चिन्ता कभी सताती है ?
क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है
राष्ट की व्यथा बहुत सताती है ...?

किसी त्योहार की उमंग नही है
दिल में मनोरंजन की तरंग नही है
किसी खोल में रूची नही है
देर रात तक नींद न मुझको आती है
क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है
राष्ट की व्यथा बहुत सताती है ...?

पदासीन पथप्रदर्शक और रक्षक
सब झूठे से लगते है महान आत्माओं के
अजादी से उम्मीदो के
सारे सपने झूठे से लगते है
नेताओ कें हर भाषण से
झूठ बनावट की बू आती है
क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है
राष्ट की व्यथा बहुत सताती है ...?

2 टिप्‍पणियां:

आलोक मोहन ने कहा…

sathak kavita

बेनामी ने कहा…

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