सोमवार, 19 जुलाई 2010

क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है ?

मुझे राष्ट की व्यथा बहुत सताती है
आज की कटु यथा बहुत सताती है
राष्ट पर लटक रहे
खतरो की चिन्ता कभी सताती है ?
क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है
राष्ट की व्यथा बहुत सताती है ...?

किसी त्योहार की उमंग नही है
दिल में मनोरंजन की तरंग नही है
किसी खोल में रूची नही है
देर रात तक नींद न मुझको आती है
क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है
राष्ट की व्यथा बहुत सताती है ...?

पदासीन पथप्रदर्शक और रक्षक
सब झूठे से लगते है महान आत्माओं के
अजादी से उम्मीदो के
सारे सपने झूठे से लगते है
नेताओ कें हर भाषण से
झूठ बनावट की बू आती है
क्या तुम्हे भी कभी राष्ट याद आती है
राष्ट की व्यथा बहुत सताती है ...?

शुक्रवार, 25 जून 2010

तुम्हारी मुस्कान से

लग रहा था
सभी कुछ भयावह
छूट रहा था मन का धैर्य
पथराने लगी थी आंखे
नही बंध पा रहा था मन
किसी भी माया में
खो चुके थे
समस्त आकार्ण,अपना रूप ॥

ना जाने कितने दिनो तक
ऐसी एकरस, नीरस रही जिन्दगी
होले होले दिन बदले तारीखे भी बदली
फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ
आकाश पर छाये बादल हटने लगे
शहर का मेौसम बदलने लगा
और तुम्हारे चेहरे पर लौट़कर आई मुस्कान
बाग लहराया कलियाँं चटकी
और फूल भी खिलखिलाने लगे
आंँखो आंँखो मे गुपचुप बाते हुई
बर्फ पिघलने लगी
तमाम शिकवे शिकायते बह गई
भय बंधन तिरोहित हुए
नजरे भी चंचल होने लगी
मन फिसलने लगा
कल तक जो डूबा था,
असीम गहरे दर्द में
वे सारे घाव भरने लगे
मन नैतिक मर्यादाओ के बंधन को लांघने,
मिलन के गीत गाने के लिए मचलने लगा
एक तुम्हारी मुस्कान से
सारा का सारा जहाँं
खुशनुमा लगने लगा ॥

गिरीशनागड़ा

शनिवार, 5 जून 2010

इन्तजार

मै हर वक्त
हर क्षण
तुम्हारे प्यार,उर्जा का
तलबगार रहा हूं।
मै रहा हूं
हर क्षण
प्यासा
तुम्हारे प्यार का ॥

तुम्हारे इन्तजार के
लम्हो को
जितना मैने झेला है
सदियो सा
एहसास दे गया
वह इन्तजार॥
मै यहॉँ जीवन पथ पर
अकेला निपट
एकाकी खड़ा
झेल रहा हूं
उस कड़ी धूप को भी
हंसते हंसते,
क्योकि
मुझे यहाँं से
दिखाई दे रही है
तुम्हारी पालकी की गुम्मद
और यहाँं की हवाओ मे
आ रही है
तुम्हारे आने की महक ॥

गिरीशनागड़ा

सोमवार, 24 मई 2010

हमारे गरीबी {गरीब} हटाओ के महान कार्यक्रम
व्यंग कविता ....गिरीश नागड़ा






हमारे गरीबी {गरीब} हटाओ के महान कार्यक्रम
व्यंग कविता ....गिरीश नागड़ा


सरकार को चाहिए कि वह
गरीबी की रेखा के नीचे भी
एक रेखा खींच दे
जिसके नीचे आने वाले इन्सान को
इन्सान नही माना जाए
दरअसल वे तो बोझ है
इस धरती पर
इसलिए नही होना चाहिए उन्हे
जिन्दा रहने का अधिकार ॥
सरकार को चाहिए कि वह
खोल दे उनके लिए भी एक बूचड़खाना
जिसमे
उनको पकड, पकडकर
सफाई का पूरा ध्यान रखते हुए,
सफाई से काट़ दिया जाए ॥
जिन्हे गरीबी की महान रेखा के
नीचे रहने योग्य भी नही पाया गया है
जिन्हे
मुफ्त की जमीन,
आवास, सडक,प्रकाश,पानी, नाली
और एकबती का मुफ्त बिजली कनेक्शन
बैंक ऋण, निराश्रित सहायता, ऋण राहत,माफी,
आदि, गरीबो की ,ेरो सुविधाओ का
लाभ लेने की भी
क्षमता, योग्यता,या शउर नही
जिनके पास
अपनी निजी या संयुक्त परिवार की
मलिकियत वाली ,किराये की
अतिक्रमण,या कही कब्जा कर हथियाई गई छत नही
जिनकी अपनी यूनियन नही
जिनको अपने अधिकारो के लिए
बंद, प्रदशर्न,हडताल तक
करने की तमीज नहीं
जिनका कोई धर्म संप्रदाय नही
जिनके पास गरीबी रेखा तक का, राशनकार्ड नहीं
जिनका वोटर लिस्ट में नाम नही
जिनका वोट नही
उनकी गणना नही
उनका समीकरण नही
अर्थात वे इन्सान ही नही ॥
सरकार को चाहिए कि वह
इन्हे इन्सान की परिभाषा से बाहर करे
ओर इन्हे घोषित करे, कृषिफसल
कुंवारी मांए सडको पर अनवरत
उत्पादित करती रहे यह कृषिफसल
ताकि इस कृषिफसल को हमारे बूचडखानो में काट कर
इनके मांस को
पांच सितारा होटलो में
मेरे मुल्क के जागीरदारो, ईदीअमीन के भारतीय संस्करणो को
और उनके सम्मानित मेहमानो को
हमारे देश की विशष्ट डिश के रूप में
सर्व किया जा सके ॥
इस कृषिफसल की खोपडी
और शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अवयवो का
निर्यात किया जा सके,विकसित देशो को
जहाँं से प्राप्त हो सके
भारी मा़त्रा मे, कींमती विदेशी मुद्रा
ताकि हम चला सके
और अधिक सुविधा व गति के साथ
गरीबी हटाने के हमारे
महान कार्यक्रम ॥

गुरुवार, 20 मई 2010

कुछ तो शर्म करो

देखो कुछ तो शर्म करो
इस तरह देश देश मत चिल्लाओ
गर्व से अपना सर यूँ न उठाओ
वास्तव में यह देश
खुद नही डूब रहा है
उसे तुम लोग ही डूबा रहे हो
शर्म करो बेशर्मो
उसपर देशभक्ति की कसमे खा रहे हो

तुम ही तो करते हो
नित हत्या ,बालात्कार,तस्करी
सारी चोरबाजारी,रिश्वतखोरी
और हर गलत काम में मुँहजोरी
तुम ही ने तो माँं बहनो के सारे अर्थ गंवा दिए है
तुम ही ने उनके लिए कोठे सजा दिए है
तुम ही तो हो जिसने
चंद लम्हो में सुखी घर संसारो को
पाप के महल बना दिये है
तुम ही ने ना जाने कितने मासूमो को
अपने मतलब की वेदी पर
बलि चा दिया है
तुम ही करते हो
सारी हिंसा तोडफोड आगजनी
तुम ही करते हो देश के प्रति ग़द्दारी
तुम ही करते हो देश को लहूलुहान
फिर भी यह देश तुम्हे अपनी गोद मे
सहला रहा है पुचकार रहा है
प्राणप्रिय की तरह दुलार रहा है
इस आसार उम्मीद में तुम्हारी
सारी गल्तियो को माफ कर रहा है
कि तुम्हे अपनी गल्तिओ का एहसास होगा
और एक दिन तुम सुधर जाओगे
पर लगता है कि तुमने तो
कसम खा रखी है कि
हम नही सुधरेंगें ॥


गिरीशनागड़ा

>ये कलाकार

ये कलाकार
सवेदना ,भावनाओं के
कुशल ,कुशाग्र चितेरे
केश से महीन
ज्ञात अज्ञात विपयो को
कितनी साफगोई से
उठाते है
वे कितने ज्ञानी,श्रेप्ठऔर समर्थ है
धीर गम्भीर गहरे और स्पप्ट है
किन्तु
जिस दिन से उनसे
परिचय हुआ है घनिप्ट
हां उसी क्षण से
वे वह नही रहे
जो अब तक थे ।
हांलाकि
सब कुछ वही है
और प्रतिपल श्रेप्ठ भी
किन्तु सच!
वे , जरा भी नही है वे
भावना और संवेदना के सागर मे डूबे वें
उनकी आंखो मे
देखते हुए आती है शर्म
और लगता है भय
कही वे हमें
समूचा निगल ही न जाये ॥
.

.गिरीश नागड़ा

बुधवार, 19 मई 2010

निर्वंशया

मैने गल्ती की
बुजुर्गो की सलाह मानी
विवाह किया बुजुर्ग खुश हुए
वे देखना चाहते थे
अपना वंश
किन्तु मै अब नही चाहता
अपना आगे वंश
किसी में भी अपना अंश
बस इसीलिए
अपनी
नसबन्दी करा दी
मै कतई नही चाहता
बुजुर्गो की इच्छा के लिए
जो पाप मै कंरू
किसी और को लाकर
वह भी वही अपराध करे
और मेरा वंश ,मेरा अंश
इस दोजख की आग में जले ॥
अब शुभ,शेष क्या है इस संसार में
न कहीं सत्य है न कही शिव न कहीं सुन्दर
है तो चारो और
ह्रिंसा,घृणा,इप्र्या,द्वेष और नफरत
दो ही आवाज सुनाई देती है
मारो या मरो
तुम मारो नही तो कोई
तुम्हे मार डालेगा
मै नही चाहता कि
दुनिया के अंत तक
मेरा खून/मेरा वंश/ मेरा अंश
इस आग में खुद जले
औरो को जलाए
नही मेरे साथ
यह नही चलेगा
मै निरवंशया कहलाउंगा
वह मुझे चलेगा
पर मेरा वंश ,मेरा अंश
अब इस दो जख की आग में नही जलेगा ॥


गिरीश नागड़ा

रविवार, 16 मई 2010

सूना है आकाश और मेरा आगंन

चारो और से
सूना है आकाश
और मेरा मन ||
दूर दूर तक नही दिखाई देता
कोई भी पंक्षी
नही आते है चिडिया और कबूतर
अब मेरी छत पर
दाना चुगने ।
नही पुकारता है
कोई कागा ,मेरी मुंड़ेर पर
और नही आता है कोई
अतिथि देव भी
अब मेरे घर पर ॥
आगंन के विशाल वृक्ष पर बैठकर
ेरो पक्षी शोर और बीट कर
अब नही परेशान करते है दादी को ,
क्योकि
आज न तो मेरी दादी है
न वह वृक्ष है ,न वह आंगन है
न ही वे पक्षी है ॥
हर रोज सुबह ,शाम
़ेर सारी पत्तियो और बीट को ,
बुहारते और बडबडाते हुए
दादी उन पंक्षीयो को
आंगन खराब करने के लिए
बददुआऍं देती थी ॥
तब
उसे नहीं मालूम था कि
उसकी बददुआ इतनी जल्दी
काम कर जायेगी ॥
अब
न तो चिडिया चहचहाती है
न कोयल कुंहुकती है
न कबूतर गुटरगूं करता है
तोता और मैना खामोश है
सोन चिरैया और गोरैया को छोड़ो
कव्वे की कर्कश ॔कांवकांव’ को भी
तरस गये है कान ॥
चारो और ़़़़़क्रित्रमता की है भाँय भाँय
नेता,अभिनेता और धनवानो ने
फैला रखा है चुग्गा चंहुं और,
कहीं भी अवकाश नही है
इन्सान के लिए ॥
आकाश में विज्ञान का विकिरण
लील गया है, पक्षियो को ,
जमीन पर इन मायावी मक्कारो का विकिरण भी
लगता है किसी दिन दिखायेगा अपना जलाल ,
और लील जायेगा हम सभी को ॥
उपर वृक्षो पर
पक्षियो के घोंसले नही बचे है
और, नीचे लगता है
केवल !
केवल,हमारे
खाली घोंसले ही बचेंगें ।


-.गिरीशनागड़ा

मंगलवार, 11 मई 2010

girishnagda ki kavita: पानी को प्यासी इस धरती पर अमृत के सपने मत लादो

girishnagda ki kavita: पानी को प्यासी इस धरती पर अमृत के सपने मत लादो

पानी को प्यासी इस धरती पर अमृत के सपने मत लादो

ओ मेरे मुल्क के मालिको
पानी को प्यासी इस धरती पर
अमृत के सपने मत लादो
पानी को प्यासी इस धरती को
बस थोड़ा सा पानी पिला दो
पानी को प्यासी इस धरती पर
तुम अमृत के सपने मत लादो ॥

लेकिन मैने देखा है
अमृत के सपनो के बीच
अन्याय शोाण की मुठि्यो में भींच
कौन कौन से जुल्म नही किये
बस इतना जरा हमे बता दो
पानी को प्यासी इस धरती पर
अमृत के सपने मत लादो ॥

राट के कर्णधारो तुम
इस मां के भूखे बच्चो को
दूध न दे सको,
तो कोई बात नही
सिर्फ आटा ही घोलकर
ईमानदारी से पिला दो ।
मगर सोने की कटोरी में
जहर पिलाने से तो बेहतर है
कि उनका गला दबा दो ॥

पानी को प्यासी इस धरती पर
तुम अमृत के सपने मत लादो
पानी को प्यासी इस धरती को
बस थोड़ा सा पानी पिला दो ॥






गिरीशनागड़ा

तुम्हारे आने की महक

तुम्हारे आने की महक
डॉ.गिरीश नागड़ा


मैं हर वक्त
हर क्षण
तुम्हारे प्यार,ऊर्जा का
तलबगार रहा हूँ।
मैं रहा हूँ
हर क्षण
प्यासा
तुम्हारे प्यार का।

तुम्हारे इन्तजार के
लम्हों को
ज‍ितना मैंने झेला है
सदियों सा
अहसास दे गया
वह इन्तजार।

मैं यहाँ जीवन-पथ पर
अकेला निपट
एकाकी खड़ा
झेल रहा हूँ
उस कड़ी धूप को भी
हँसते-हँसते,
क्योंकि
मुझे यहाँ से
दिखाई दे रही है
तुम्हारी पालकी की गुम्बज
और यहाँ की हवाओं में
आ रही है
तुम्हारे आने की महक।
Posted by girish.nagda

सिर्फ दो मुट्ठी राख

डॉ.गिरीश नागड़ा


जब-जब भी आँखें खोली हैं
आँखों की पोरें गीली हैं
नींद तो कभी आई ही नहीं
पर एक स्वप्न जीवन भर
आँखों में पलता रहा
बर्फ पिघलेगी कभी
क्रूर, गर्वित, उन्नत ठंडे
हृदयहीन समय की।
आएगा कभी
उस उष्मा का मौसम
जब मैं और तुम
हँस सकेंगे
सारी फिजाँ को जी भरकर
प्यार करते हुए।
गले लगते-लगाते हुए
महसूस कर सकेंगे
अपरिमित हर्ष।
हमारे बीच,
कहीं ईर्ष्या, विद्वेष,दर्प
घृणा,नफरत और अहंकार
मेरा, तुम्हारा
धर्म, धन, सम्पदा,
देश, राज्य, नस्ल और भाषा का
कहीं कोई भेद न रहेगा
हम देखेंगे
कुदरत की हर नियामत को
कृतज्ञता के झरोखों से
और आती हुई प्राणवायु को
नथूनों में भरकर
छाती को फूला सकेंगे
जीवन के हर क्षण को,
अमृत-सा पी सकेंगे
पूरे-पूरे आदमी होकर जी सकेंगें
क्योकि हम जानतें हैं
हमारा अपना सच
सिर्फ दो मुट्ठी राख है
वह भी हमारी नहीं
इसी जहाँ से हमने पाई है
और वह भी
यहीं रह जाएगी।
by girish.nagda

मंगलवार, 4 मई 2010

जानवर और इन्सान

एक जीवन
एक जानवर/ एक इन्सान
जानवर / निरीह, मूक, व असहाय ।
काटा,चमड़ा उतारा।
लटका दिया दुकानदार ने
इन्सानो के बाजार मे
इन्सानी भूख के लिए ॥
इन्सान / विश्व शांति, विश्वबंधुत्व
अहिंसा प्रेम ,करूणा
संवेदनाओं का अथाह सागर
आह!सागर
सागर / गागर
गागर/सागर ॥
एक हत्या एक जानवर/ एक इन्सान
बहता खून, तड़फडाता शरीर
खून की लाली और
कटने का दर्द
दोनो एक है ,मगर
एक के लिए है आंसू
दूसरे के लिए है
एक क्रूर मुस्कान ॥
एक हत्या एक जानवर/ एक इन्सान
इन्सान हाय कलेजा /
कितना पत्थर,कठोर,निर्मम
आलोचनाएं, भत्सर्नाएंऔर सजाएं
जानवर हाय कलेजा/
कितना लजीज,स्वादिष्ट और उम्दा
कृपादृटि,प्रशंसा,और पुरूस्कार ॥

इन्सान/जिसका खाया,
उससे किया दगा
जानवर/जिसका खाया,या न भी खाया
उसके लिए दे दिया सर्वस्व ॥
जानवर तो पशु है
पशु / हिंसा ,वहशीपना,असहिष्एाुता
पशु/ न तरतीब,न तहजीब न तमीज
पशु/न भूत, न वर्तमान,न भविय
पशु/न इतिहास,न सभ्यता, न संस्कृति
पश्।ाु/कुछ भी नहीं/सब कुछ
सभी कुछ ।
इन्सान/ सब कुछ/सभी कुछ
परन्तु कुछ भी नहीं
ओछा,कृतघन व नंगा ॥
... गिरीश नागड़ा

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

सच्चा परिचय




मेरी अर्द्धागिंनी ने
एक सुन्दर, फूल से बालक को
जन्म दिया
सभी उसके दुलार की
खुशी में खो गये
जब वह बिमार हुआ ।
मेरा खाना पीना,सोना दुश्वार था
सारी रात गोद में लेकर पंखा झलता था
ड़ाक्टरो के पास आधी रात को दौड़ता था
जो सामने खड़े भी न रह सके
उसके लिए उनकी भी खुशांमदे की है मैने ॥
जब वह अपनी शिक्षा पूरी कर
जीवन के मैदान में उतरा था
तब कलेजा भय व आशंका से कांप रहा था
सोचता था मेरा फूल सा कलेजे का टुकड़ा
कैसे समायोजित कर पायेगा
इस चालाक,मक्कार,निर्मम दुनिया में
अपने आप को ॥
परन्तु
मुझे पता ही न चला कि
कब इस निर्मम दुनिया में
खुद को समायोजित करते करते
वह खुद इतना निर्मम हो गया
सुबह वृद्घाश्रम की विवरणिका देकर के बोला
शाम तक इनमें से कोई एक चुन लेना
कल रविवार है ,मुझे छुट्टी है
आपको छोड़ आउंगा ॥
तब मुझे लगा कि
अपने बेटे से ंमेरा सच्चा परिचय
तो आज हुआ है ॥

गिरीश नागड़ा

मन की तृष्णा

हर क्षण
जीने की आशा में
मरते जाते है हम
एक विचार को
अंतिम सत्य मानकर
उसके पीछे भागते है हम
और जब उसके
निकट पंहुंचते है हम
तो देखते है
सच का दूसरा ही रूप
हमारे सामने खड़ा है ॥
किसी मृग मरिचिका के पीछे
फिर भी भागते रहते है सतत
इसी तरह हम ।
एक सत्य से दूसरे पर
परन्तु समझ नही पाते है
जीवन के उदय से अस्त तक
हम
अपमे मन की तृष्णा को ॥

गिरीशनागड़ा

आखिर ! कब तक

तुम ये या वह
क्यो मुझे
विवश करते है बार बार
नफरत घृणा,द्वंद के लिए ॥
क्या,तुम नही जानते,
इन सबके चरम परिणाम ।
परमाणु एवं रासायनिक युद्ध की
कैसी कैसी विभीषिकाये
दुनिया झेल चुकी है ।
आज कोई भी तीन मिनट
समूची सभ्यता ,और पृथ्वीे को
जीवन विहीन कर सकते है ॥
तुम्हारी राह पर चलकर किस को
कब लाभ हुआ है ,आज तक ।
यह सरासर महंगा ,घाटे का सौदा है
क्यो चाहते हो ,विवश करते हो
कि मै यह सब करुं
अपनी संपूर्ण शक्ति और सामथ्र को
विनाश की तबाही कगार तक
पोषित करता रहूं
और अपने सारे
उसूल, सिद्घांत,आदशर ,उदेश्य और जीवनमूल्य
जिनकी मै पूजा करता हूं
उन्हे एक बारगी ही भूला दूं
मै तो
बार बार तुमसे छुपकर ,बचकर
निकल जाना चाहता रहा हूॅ।
किन्तु तुम
हर रास्ते,हर मोड पर
अलग अलग चेहरो के साथ
मुश्तेैद खडे मिलते हो
धमकाते, मूंछो पर बल देते हुए
कब तक
अपमानित होकर, गरल पीता रहूंगा
आखिर !
मै देवता तो नही ॥
गिरीशनागड़ा

हम सदा तुम्हारे साथ है

सुनो!
उठो
देखो
समय की धारा को कोई
मोडने का
प्रयास कर रहा है
देखो
समझो
और उसका साथ दो
उसे राकने की अक्षम्य भूल न करो
बल्कि
उसे हौसला दो
उसे कहो
वह आगे ब़े
दृढ़ रहे, हिम्मत रखे
कहे,हम साथ है
हम सब मिलकर साथ देंगे, तुम्हारा
और एक दिन
समय की इस पीड़ा दायक चुभन को
मिटाकर ही दम लेंगे
तुम चलते चलो,
संघर्ष करो
हम हर कदम पर
तुम्हारे साथ है
दिल से
क्योकि हम भी चाहते है कि
इस माहोल को बदला जाए
अति का अंत हो जाए ।
पटेल, शास्त्री, सुभा से महापुरू
अब,
इस धरा पर आयेंगें नही
यह बीड़ा, आज नही तो कल
हम तुम को ही उठाना होगा
तुमने उठाया है,तुम्हे साधुवाद
कभी अपने को अकेला मत समझना
हम सदा तुम्हारे साथ है
कदम दर कदम ॥

...गिरीश नागड़ा

हे मेरे मुल्क के मालिक, व्यंग कविता

हे नागरिक
हे मेरे मुल्क के मालिक,
तू ड़र मत
हलचल मत कर
चल विचल मत हो
उठकर आ
चल लाइ्रर्न लगा
फिर मुझे वोट दे
अब तू घर जा
लंबी चादर तान
और आराम से सो जा ॥
सुबह उठ , स्नानकर आंखे मूंदकर,ईर्र्श्वर का ध्यानकर
मधुर मधुर सुर में मीठेमीठे भजन गा ।
पानी छानकर पी
उपासना व व्रतकर
अपना कर्म
पूरी मेहनत और लगन से कर ॥
ईधरउधर मत देख
चलविचल मत हो
अपने आराध्य पर पूरा पूरा विश्वास कर ।
आत्मा अमर है,शरीर नश्वर है
चिन्ता मतकर
होनी को कौन टाल पाया है
आज तक ।
रोना तो कायरता है
संतोषी नर सदा सुखी
मुस्कुराहट ही जीवन है, धीरज मोटीबात है
कष्ट और दुख तो परीक्षा है
वैतरणी पार करने की शिक्षा है ॥
इष्र्या व क्रोध मतकर
लालच बुरी बला है
सत्यमेव जयते
सच्चे मन से श्रमकर
खूब उत्पादन ब़ा
उत्पादन लक्ष्य को पूर्णकर
राष्ट को उपर उठा संपूर्ण राष्ट तेरा है
तेरी ही संपति है
मै भी तेरा ही हूं जो कुछ मेरा है,वह तेरा है
और जो तेरा है,वह मेरा है ।
तू मालिक है,मै सेवक हूं
तू है स्वामी ,मै हूं पहरेदार॥
अब चल ,डर मत
मतदान केन्द्र आ
मेरे चुनावचिन्ह को ,खूब ध्यान से देख
कोई भी शंका कुशंका मतकर
क्या तेरा है क्या मेरा है
जग चार दिन का डेरा है
तू लगन से अपना कर्मकर
मेरे चुनावचिन्ह पर
ध्यान से,प्रेम से,अपनी मोहर लगा
कर्मण्ये वाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचना
अगले निर्वाचन पर अवश्य आना
और मुझे, अपना कीमती वोट देना भूल ना जाना
अवश्य आना ।ं।
मुझे वोट दे दिया अब चल ,परे हट ,बाजू हो ,जल्दीकर
दूसरे को आने दे, बुरा मत मान
जरा हवा तो आने दे
ठंडी ठंडी, सुखद,प्यारी प्यारी
सत्ता की,धन की ,पावर की, मधुर हवा
जो मेरे महान वंश की आत्माओं को
असीम शीतलता, शांति प्रदान करेगी
तूझे भी तो उसका पुण्य मिलेगा न
धन्यवाद लेकर,चल सीधा घर जा
अब सर पर बैठेगा क्या मेरे बाप
चल श्याना बन,रास्ता नाप ।
अगले चुनाव से पहले
दिखाई भी मत देना
मनहूस ॥
गिरीशनागड़ा

कृतज्ञ हूं मै सदा आपका

मैने नही किया है उनकी
अनुकम्पा का ऋण अदा
बरसती रही मुझ पर
फिर भी उनकी असीम कृपा
और स्नेह सदा ॥
जब भी लगी मुझे धूप जरा
झट से घुस जाता था मै सदा
उनके आँचल की छाँव में
अपने हिस्से की छाँव भी
मुझे ओ़ाकर वे खुद सह लेती
सारी तीखी धूप ,तपन और चुभन
जिनको सहारा ,छाँव ,शीतलता देना
फर्ज था मेरा वह तो ंमै निभा नही पाया ॥
कभी लेशमात्र भी उऋण
हो नही पाउंगा उनके कर्ज से
फिर भी मेरी कृतद्यनता की परवाह न कर
जो सदैव अटूट कृपा रही है मुझ पर
तो आज शोष है मेरा ये अस्तित्व
वरना मै तो कब का
बिखर गया होता ॥

गिरीश नागड़ा

सोमवार, 29 मार्च 2010

जानवर और इन्सान -गिरीश नागडा

One life
An animal / a person
Animals / Nirih, muke, and helpless.
Cut, leather half
Shopkeeper hung
in the market of human
For human hunger.
Human / world peace, Biswbndhutw
Nonviolence love, compassion
Unfathomable ocean of emotions
Ah! Sea
Sea / Gagr
Gagr / ocean.
One killed one animal / one person
Flowing blood, body Tdfdata
Blood red and
Cut the pain
Both have one, but
One for tears
The second is for
A cruel smile.
One killed /one animal / one person
OH! human liver /
How rock, hard, cruel
Criticism, abuse,punishment
Hi animal liver /
So tasty, tasty and excellent
Kripadristi, prasansa, and Puruskar.

Man / who ate
Has betrayed him
Animals / who ate or eaten
Gave him supreme.
Animals is the Animal
Animals / violence, Vhshipana, Ashisnuta
Animals / no order, no culture no manners
Animals / no ghosts, no present or future
Animals / no history, no civilization, no culture
Animals /no anything / but everything
Everything.
Human / Everything / Everything
But nothing
Frivolous, Kritagn and naked.
Dr. Girish Nagda (girish.nagda@yahoo.com)

जानवर और इन्सान - गिरीश नागडा

एक जीवन
एक जानवर/ एक इन्सान
जानवर / निरीह, मूक, व असहाय ।
काटा,चमड़ा उतारा
लटका दिया दुकानदार ने
इन्सानो के बाजार मे
इन्सानी भूख के लिए ॥
इन्सान / विश्व शांति, विश्वबंधुत्व
अहिंसा प्रेम ,करूणा
संवेदनाओं का अथाह सागर
आह!सागर
सागर / गागर
गागर/सागर ॥
एक हत्या एक जानवर/ एक इन्सान
बहता खून, तड़फडाता शरीर
खून की लाली और
कटने का दर्द
दोनो एक है ,मगर
एक के लिए है आंसू
दूसरे के लिए है
एक क्रूर मुस्कान ॥
एक हत्या एक जानवर/ एक इन्सान
इन्सान हाय कलेजा /
कितना पत्थर,कठोर,निर्मम
आलोचनाएं, भत्सर्नाएंऔर सजाएं
जानवर हाय कलेजा/
कितना लजीज,स्वादिट और उम्दा
कृपादृटि,प्रशंसा,और पुरूस्कार ॥

इन्सान/जिसका खाया,
उससे किया दगा
जानवर/जिसका खाया,या न भी खाया
उसके लिए दे दिया सर्वस्व ॥
जानवर तो पशु है
पशु / हिंसा ,वहशीपना,असहिएाुता
पशु/ न तरतीब,न तहजीब न तमीज
पशु/न भूत, न वर्तमान,न भविय
पशु/न इतिहास,न सभ्यता, न संस्कृति
पशु/कुछ भी नहीं/सब कुछ
सभी कुछ ।
इन्सान/ सब कुछ/सभी कुछ
परन्तु कुछ भी नहीं
ओछा,कृतघन व नंगा ॥
हपतपेीण्दंहकं/लींववण्बवउ डॉ.गिरीश नागड़ा